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धीरे-धीरे खत्म हो रही है गांव में परंपरागत होली का गायन

बिहार

जैसे-जैसे आधुनिक युग में तकनीक का समय आया वैसे वैसे समृद्ध परंपराएं धीरे-धीरे पीछे छूटती गई । इसी तरह की एक परंपरा गांव में फागुन के पूरे महीने चौपाल में बैठकर होली गाने की थी। गांव में यह परंपरा दो दशक तक पहले तक काफी वृहत रूप में था। शाम होते ही गांव के बुजुर्ग और युवा पीढ़ी ढोलक, हरमुनियम, झाल, मंजीरा लेकर बैठते थे। होली का गायन देर रात तक चलता था। उत्साह और उमंग के इस माहौल का दौर धीरे-धीरे खत्म हो गया। या कुछ गांव में जाकर ही सिमट गया है। हालांकि कई गांवों में आज भी होली के दिन इस परंपरा का निर्वाह होता है।

इसको लेकर शेखपुरा जिले के अरियरी प्रखंड अंतर्गत करकी गांव निवासी संजीत सिंह कहते हैं कि गांव में अब यह परंपरा धीरे-धीरे खत्म हो गई है। इसका एक प्रमुख कारण अब हर हाथ में मोबाइल है और मनोरंजन के कई साधन हैं । ऐसे में लोग एक साथ बैठना उचित नहीं समझते। इंटरनेट मीडिया के कई प्लेटफार्म पर लोग अपने आप को सामाजिक बताते हैं परंतु सामाजिकता धीरे-धीरे लुप्त हो रही है।

इसको लेकर मेहूस गांव निवासी शिक्षाविद अंजेश कुमार कहते हैं कि नई पीढ़ी और पुरानी पीढ़ी के बीच का अंतर धीरे-धीरे होली पर हावी हो गया। नई पीढ़ी के मन में पुरानी पीढ़ी के प्रति सम्मान का घटना भी गांव के चौपाल में होली के खत्म होने का एक बड़ा कारण हो गया।

इसको लेकर शेखपुरा के सामाजिक कार्यकर्ता श्रीनिवास कहते हैं कि सामाजिकता का आभाव इसका सबसे बड़ा कारण है। पहले चौपाल में बैठकर पुराने होली का गायन होता था जिसमें भगवान राम, शिव, शंकर, कृष्ण इत्यादि पर होली का गायन लोगों को झूमने पर विवश कर देते थे।

इसी को लेकर जिले के घाटकुसुंभा प्रखंड अंतर्गत माफो निवासी विपिन सिंह कहते हैं कि पहले नक बेसर कागा ले भागा, चौपद्दा, सदा आनंद रहे यही द्वारे मोहन खेले होली रे इत्यादि होली गाए जाते थे परंतु अब वह दौर खत्म हो गया।