सोशल मीडिया एल्गोरिदम का राज: कैसे फंसाते हैं लोगों को जाल में

सोशल मीडिया एल्गोरिदम का राज: कैसे फंसाते हैं लोगों को जाल में

नई दिल्ली।

आज के डिजिटल युग में सोशल मीडिया हमारे जीवन का अभिन्न हिस्सा बन चुका है, लेकिन इसके पीछे छिपा है एक चतुर एल्गोरिदम का खेल। इंस्टाग्राम, फेसबुक, टिकटॉक और यूट्यूब जैसे प्लेटफॉर्म्स रेकमेंडर सिस्टम का इस्तेमाल करते हैं, जो आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस और मशीन लर्निंग पर आधारित होते हैं।

ये एल्गोरिदम आपके हर छोटे व्यवहार को ट्रैक करते हैं। आप किसी पोस्ट या वीडियो पर कितना समय बिताते हैं, क्या लाइक करते हैं, कमेंट लिखते हैं, शेयर करते हैं या स्क्रॉल करके आगे बढ़ जाते हैं। साथ ही आपका पुराना व्यवहार भी ध्यान में रखा जाता है। इसके बाद एल्गोरिदम अनुमान लगाता है कि कौन सा कंटेंट आपको सबसे ज्यादा आकर्षित करेगा, यानी लाइक, कमेंट, शेयर या लंबे समय तक देखने पर मजबूर करेगा।

मुख्य मकसद सिर्फ एक है। आपको प्लेटफॉर्म पर जितना ज्यादा समय तक रोके रखना, ताकि ज्यादा से ज्यादा विज्ञापन दिखाए जा सकें। टिकटॉक का फॉर यू पेज इसकी सबसे बेहतरीन मिसाल है। कुछ वीडियो देखते ही यह आपकी पसंद समझ लेता है और उसी तरह का कंटेंट दिखाने लगता है। इंस्टाग्राम रील्स और यूट्यूब शॉर्ट्स भी इसी तरीके से काम करते हैं।

ध्यान देने वाली बात यह है कि एल्गोरिदम आपकी खुशी या फायदे को नहीं देखता। वह सिर्फ एंगेजमेंट पर नजर रखता है। इसलिए नकारात्मक, आउट्रेज पैदा करने वाला या भावुक कंटेंट ज्यादा दिखाया जाता है, क्योंकि वह ज्यादा रिएक्शन पैदा करता है।

प्लेटफॉर्म्स को लोगों को व्यसन में फंसाने के लिए जानबूझकर डिजाइन किया गया है। ये हुक मॉडल पर काम करते हैं, जिसमें ट्रिगर, एक्शन, वैरिएबल रिवॉर्ड और इन्वेस्टमेंट शामिल होते हैं। मुख्य तरीके इस प्रकार हैं। इन्फिनिट स्क्रॉल, यानी फीड कभी खत्म नहीं होती। पहले फेसबुक में फीड का अंत होता था, लेकिन बाद में उसे हटा दिया गया ताकि लोग रुकें ही न।


वैरिएबल रिवॉर्ड, यानी लाइक, कमेंट और नोटिफिकेशन अनप्रेडिक्टेबल होते हैं, ठीक स्लॉट मशीन की तरह, जिससे दिमाग में डोपामाइन रिलीज होता है। नोटिफिकेशन्स और रेड डॉट्स फोन बार बार चेक करने को मजबूर करते हैं। पर्सनलाइज्ड फीड आपकी कमजोरियों जैसे फोमो, ईर्ष्या या गुस्से को टारगेट करता है। पुल टू रिफ्रेश बटन जुआ खेलने जैसा लगता है। सोशल प्रूफ के तहत लाइक्स, व्यूज और शेयर्स दिखाकर लोगों को और पोस्ट करने या देखने के लिए प्रोत्साहित किया जाता है।

नतीजा यह है कि औसत यूजर रोजाना दो घंटे 23 मिनट सोशल मीडिया पर बिताता है।

दुनिया भर में सोशल मीडिया का इस्तेमाल करने वालों की संख्या अक्टूबर 2025 के आंकड़ों के अनुसार 5.66 अरब है, यानी पूरी दुनिया की लगभग 69 प्रतिशत आबादी। इंटरनेट यूजर्स में से 93.8 प्रतिशत लोग हर महीने सोशल मीडिया पर सक्रिय रहते हैं। पिछले एक साल में 25.9 करोड़ नए यूजर्स जुड़े हैं।

टॉप प्लेटफॉर्म्स की बात करें तो फेसबुक के मंथली एक्टिव यूजर्स 3.07 अरब हैं। व्हाट्सएप और इंस्टाग्राम दोनों के 3 अरब हैं। यूट्यूब के 2.58 अरब और टिकटॉक के लगभग 2 अरब यूजर्स हैं।

सोशल मीडिया का उपयोग कम करने के लिए कई व्यवस्थित उपाय अपनाए जा सकते हैं। सबसे पहले फोन की सेटिंग्स में इंस्टाग्राम, टिकटॉक और फेसबुक आदि के लिए रोजाना 30 से 45 मिनट की स्क्रीन टाइम लिमिट लगा दें। आईफोन में स्क्रीन टाइम और एंड्रॉयड में डिजिटल वेलबीइंग का इस्तेमाल करें।

सभी नोटिफिकेशन्स बंद कर दें। सिर्फ जरूरी मैसेज जैसे व्हाट्सएप फैमिली ग्रुप रखें, बाकी साइलेंट या ऑफ कर दें।

फोन को बेडरूम से बाहर रखें। सोने से पहले और सुबह सबसे पहले फोन न छुएं।

डिवाइस फ्री जोन और टाइम बनाएं। खाना खाते समय, परिवार के साथ, वॉक या एक्सरसाइज के दौरान और बेडरूम को नो फोन जोन बना दें।

ग्रेजुअल डिटॉक्स अपनाएं। पहले रोज एक घंटा कम करें, फिर हफ्ते में एक दिन पूरा ऑफ रखें।

स्क्रॉलिंग की जगह रिप्लेसमेंट एक्टिविटी चुनें। वॉक करें, किताब पढ़ें, कोई हॉबी अपनाएं, दोस्तों से मिलें, जिम जाएं या म्यूजिक बजाएं।

ऐप्स को मुश्किल बनाएं। उन्हें होम स्क्रीन से हटा दें, लॉगआउट करके रखें और ग्रेस्केल मोड यानी काला सफेद रंग चला दें।

ट्रैकिंग और अकाउंटेबिलिटी रखें। स्क्रीन टाइम रिपोर्ट देखें और किसी दोस्त या परिवार के सदस्य से शेयर करें कि आप उपयोग कम करना चाहते हैं।

माइंडफुलनेस अपनाएं। हर बार फोन उठाने से पहले खुद से पूछें कि मुझे सच में क्या चाहिए, जानकारी या बस बोरियत मिटानी है।

अगर आदत बहुत ज्यादा लगे तो कुछ दिनों का पूरा डिजिटल डिटॉक्स लें। रिसर्च बताती है कि इससे डिप्रेशन और एंग्जायटी कम होती है तथा नींद बेहतर होती है।

आखिर में यह समझना जरूरी है कि सोशल मीडिया बुरा नहीं है, लेकिन इसका डिजाइन हमें फंसाने के लिए तैयार किया गया है। जब आप समझ जाते हैं कि यह कैसे काम करता है तो आपका कंट्रोल वापस आ जाता है।

शुरुआत आज से करें। सिर्फ एक उपाय चुनें और उसे सात दिन तक फॉलो करें। आप खुद देखेंगे कि कितना फर्क पड़ता है।

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