जन्म लाहौर में, कर्मभूमि भागलपुर बनी—280 बार चुनाव लड़ने वाले ‘धरती पकड़’ की आखिरी यात्रा

जन्म लाहौर में, कर्मभूमि भागलपुर बनी—280 बार चुनाव लड़ने वाले ‘धरती पकड़’ की आखिरी यात्रा

भागलपुर।

कुछ लोग चुनाव लड़ते हैं जीतने के लिए, कुछ सत्ता तक पहुंचने के लिए और कुछ ऐसे भी होते हैं, जो चुनाव को समाज को आईना दिखाने का माध्यम बना लेते हैं। भागलपुर के नागरमल बाजोरिया ऐसे ही शख्स थे। चुनावी मैदान में बार-बार उतरने की जिद ने उन्हें ऐसा नाम दिया, जो उनके असली नाम से कहीं अधिक चर्चित हो गया—‘धरती पकड़’।

लाहौर की धरती पर जन्मे नागरमल बाजोरिया का जीवन भागलपुर की मिट्टी में आकार लिया। वर्ष 1930 में लाहौर में जन्मे बाजोरिया परिवार ने देश के विभाजन से पहले ही भागलपुर के एमपी द्विवेदी रोड के किनारे अपना आशियाना बना लिया था। जन्मभूमि भले ही आज पाकिस्तान में है, लेकिन जीवन की कर्मभूमि भागलपुर बनी और अंततः इसी शहर की मिट्टी में उनकी अंतिम विदाई हुई।

सितंबर 2026 में 97 वर्ष की आयु में पटना में उनका निधन हो गया। उनके जीवन की सबसे अनोखी पहचान थी—चुनावी मैदान में उतरने का अद्भुत जुनून। नगर निकाय के चुनाव से लेकर राष्ट्रपति चुनाव तक उन्होंने 280 से अधिक बार अपनी उम्मीदवारी पेश की। हर बार जीत उनकी मंजिल नहीं थी। उनके पोते सौरव बाजोरिया के अनुसार, दादा जी चुनाव इसलिए लड़ते थे कि आम मतदाता यह समझ सके कि लोकतंत्र में सत्ता के दरवाजे केवल बड़े लोगों के लिए नहीं हैं।

करीब 30 वर्ष की उम्र में उन्होंने भागलपुर नगरपालिका का चुनाव जीतकर अपने राजनीतिक सफर की शुरुआत की थी। इसके बाद चुनाव उनके जीवन का जैसे स्थायी हिस्सा बन गया। वर्ष 1969 में उन्होंने तत्कालीन राष्ट्रपति वीवी गिरि के खिलाफ भी नामांकन दाखिल किया। इंदिरा गांधी के खिलाफ रायबरेली, राजीव गांधी के खिलाफ अमेठी और संजय गांधी, अटल बिहारी वाजपेयी, लालकृष्ण आडवाणी तथा प्रणब मुखर्जी जैसे दिग्गज नेताओं के खिलाफ भी उन्होंने चुनावी मैदान में अपनी मौजूदगी दर्ज कराई।

गधे, घंटी और भ्रष्टाचार के खिलाफ आवाज

उनका चुनाव प्रचार भी आम नेताओं से बिल्कुल अलग होता था। वर्ष 2005 के चुनाव में भ्रष्टाचार के खिलाफ संदेश लिखे नारों के साथ उन्होंने अनूठी रैली निकाली। रैली में गधों को शामिल किया गया और उनके गले में भ्रष्टाचार विरोधी नारों की तख्तियां लटकाई गईं। यह तरीका भले ही विचित्र लगता हो, लेकिन उसका संदेश सीधा था—व्यवस्था पर सवाल उठाइए और अपनी आंखें खुली रखिए।

नागरमल बाजोरिया की कलाई पर गांधीजी के जमाने की घड़ी रहती थी और हाथ में घंटी। वे रैली के दौरान घंटी बजाते हुए लोगों को लोकतंत्र के प्रति जागरूक करने का प्रयास करते थे। उनके लिए चुनाव महज पर्चा भरने या वोट मांगने की प्रक्रिया नहीं थी, बल्कि जनता से संवाद का एक अवसर था।

उनका जीवन केवल चुनावी किस्सों तक सीमित नहीं रहा। समाजसेवा भी उनके व्यक्तित्व का महत्वपूर्ण हिस्सा थी। गरीब परिवारों की बेटियों की शादी में मदद करना हो या पेयजल की समस्या से जूझते इलाकों में अपने खर्च से हैंडपंप लगवाना—वे अपनी क्षमता के अनुसार लोगों की मदद करते रहे।

हार में भी तलाशते रहे जीत

280 से अधिक बार चुनाव लड़ना और अधिकांश बार हार जाना सामान्य राजनीतिक जीवन की कसौटी पर असफलता माना जा सकता है। लेकिन ‘धरती पकड़’ ने हार की परिभाषा ही बदल दी। उनके लिए जीत मतगणना में नहीं, बल्कि उस संदेश में थी कि एक सामान्य नागरिक भी लोकतंत्र के सर्वोच्च मंच तक पहुंचने का साहस कर सकता है।

वर्ष 2019 तक वे चुनावी मैदान में सक्रिय रहे। उम्र बढ़ती गई, लेकिन चुनाव लड़ने का जुनून कम नहीं हुआ। उनके लिए लोकतंत्र दर्शक दीर्घा में बैठकर देखने की चीज नहीं, बल्कि मैदान में उतरकर निभाने की जिम्मेदारी थी।

लाहौर में जन्मे इस जुझारू इंसान की जीवन यात्रा पटना में थमी, लेकिन उनकी अंतिम यात्रा भागलपुर से पूरी हुई। जिस शहर ने उन्हें अपनाया, पहचान दी और उनकी कर्मभूमि बना, उसी शहर की मिट्टी ने उन्हें अपनी गोद में समेट लिया।

‘धरती पकड़’ अब नहीं हैं, लेकिन उनके जीवन की सबसे बड़ी सीख शायद यही है—हर हार के बाद मैदान छोड़ देना आसान है, मगर अपने विश्वास के साथ बार-बार मैदान में उतरना ही असली जीत है।

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